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Monday, February 21, 2011

खाली कमरा


इस कमरे के खाली रूप को धीरे-धीरे कदमो की आहटें और हंसी की गूँज जब भरने लगती है तब इस खाली कमरे का रूप कुछ यूँ लगता है जैसे न जाने आज कितने अनुभव बांटे जांयेंगे इस महफिल में| अचानक आवाजें` शुरू हो रही है| कमरे के खालीपन में धीमी से धीमी आवाज़ की गूँज भी सुनी जा सकती है| चिड़ियों की आवाजें इस खालीपन से ज्यादा और बेहतर कहीं नहीं सुनी जा सकती| खिड़की की रौशनी से पूरा कमरा भरपूर है| टयूबलाइट की रौशनी न के बराबर ही प्रतीत हो रही है|  

हंसी की गूंज और तेज़ी से आती क़दमों की आहटें बता रही है कि जल्द ही कमरे में कोई दाख़िल होने वाला है| तभी बाहर देखती हुई एक साथी कमरे में दाख़िल होते ही आगे डेक्स पर बैग पटकते हुए बोली - "आज मैं सबसे आगे बैठुंगी, मैडम के सामने| "  दूसरी भी उसके साथ बैग रखते हुए- "मैन भी " | बस इतना था कि दोनों दरवाज़े से बाहर हुई|

ठीक सामने ब्लेक बोर्ड पर कुछ प्रश्न-उत्तर लिखे हुए थे जो फिलहाल बीते हुए कल का पर्चा खोले हुए थे| ब्लेक-बोर्ड पर सिवाय उसके कुछ भी नहीं एक दम साफ जैसे वह किसी एक व्यक्ति के लिए ही लगा हो| साझेदारी का उसपर एक भी निशान कहीं भी गलती से नहीं हैं| आवाजों की गूँज लगातार बढती जा रही है शायद कुछ साथी कमरे के आस-पास और कुछ कमरे से दूर हैं जिसकी गूँज साफ सुनाई नहीं दे रही| वह शोर की तरह कानों को छू रही है| धीरे-धीरे कमरे में दाख़िल होते साथी अपनी-अपनी पसंद की जगह पर बैग रखते और कमरे से बाहर चले जाते और कुछ कमरे में ही बैठ रहे हैं| हल्की-हल्की धुप ने कमरे में दाख़िल होना शुरू कर दिया है जिससे कमरे में धूप का शेडो बिखर रहा है|  धीरे-धीरे डेक्स उस शेडो की तरफ खिंच रहे हैं |

अब कई बैग और पानी की बोतल डेक्स पर नज़र आने लगीं हैं| जो उन खाली ड़ेक्सों पर किसी की मौजूदगी को को रख रहे हैं| तभी एक घंटी की गूँज के साथ एक  साथी जैसे कमरे से बाहर नहीं जाना चाह रही| वो अपनी जगह से उठकर दीवार की तरफ बनी लाइन के सबसे पीछे के डेक्स पर एकदम शांत होकर जा बैठी| लेकिन उसकी आँखें बार-बार हल्की-सी आहट पर फ़ैल जाती और वो नीचे झुक जाती लग रहा था जैसे वो आहट उसी के लिए हो जिसे वह बख़ूबी समझ पा रही हो| चेहरे पर चौकन्नापन कहीं कोई उसे क्लास में देख न ले|

तभी एक टीचर ने दरवाज़े से अन्दर झाँका, कमरे में किसी को न पाकर उसने अपना बैग और रजिस्टर रखा और खुद भी बाहर हो चली| कमरा एक बार फिर शांत हो चुका था चिड़ियों की आवाजें फिर से साफ सुनाई दे रही थी तभी बाहर से एक गूँज सुनाई देने लगी जैसे बहुत से लोग एक साथ कोई धुन को सीखने का रियाज़ कर रहे हों| कुछ आवाज़ धीमे पर पहले आती और कुछ उसके बाद जो एक धुन की तरह होती|  इस आवाज़ के साथ ही वह साथी अब खड़ी होकर खिड़की से बाहर झांकते हुए बुदबुदाई...इससे तो अच्छा होता कि मैं प्रार्थना में चली जाती| अगर आज मैडम ने पकड़ लिया होता तो बहुत मार पड़ती|


kiran




5 comments:

Vijay Kumar Sappatti said...

पहली बार आपके ब्लॉग पर आया हूँ . बहुत अच्छा लगा .. स्कूल की जिंदगी को , जो कि बहुत पीछे छूट गयी है ... आपके लेखो के माध्यम से फिर से जी ली है ..

बधाई

आभार
विजय
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कृपया मेरी नयी कविता " फूल, चाय और बारिश " को पढकर अपनी बहुमूल्य राय दिजियेंगा . लिंक है : http://poemsofvijay.blogspot.com/2011/07/blog-post_22.html

उर्वर ज़मीन said...

जी शुक्रिया....

Vikas Kumar said...

Dear Kiran,
Really you remind me my old days.

Thank You.
Viki

Vikas Kumar said...

Dear Kiran,
You remind me my old days.

Thank You.
Viki

HARSHVARDHAN said...

पहली बार आपके ब्लॉग पर आया हूँ। एक अच्छी प्रस्तुति।
कृपया वर्ड वेरिफिकेशन हटा दीजिये।

घुइसरनाथ धाम - जहाँ मन्नत पूरी होने पर बाँधे जाते हैं घंटे।